भारतीय जीवन बीमा निगम भारत में बीमा शिक्षा, भारतीय बीमा संस्थान बीमा एजेंटों की समीक्षा लेता है
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भारत में बीमा शिक्षा – उत्पत्ति और विकास
भारत में बीमा शिक्षा की आवश्यकता प्रारंभिक समय से ही महसूस की गई थी। बीमा कंपनियों के प्रमुख अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित थे कि बीमा उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों और एजेंटों को उचित प्रशिक्षण और शिक्षा मिलनी चाहिए। इसी उद्देश्य से इंडियन लाइफ एश्योरेंस ऑफिसेस एसोसिएशन (ILAOA) की स्थापना की गई थी, जिसका एक मुख्य उद्देश्य जीवन बीमा के सिद्धांतों और विज्ञान की जानकारी फैलाना और इसके अध्ययन को बढ़ावा देना था। बीमा शिक्षा की आवश्यकता और प्रारंभिक प्रयास
1934 में ILAOA की वार्षिक आम सभा में अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री के.सी. देसाई ने इस बात पर जोर दिया कि भारत में जीवन बीमा के प्रति जागरूकता तो है, लेकिन अशिक्षा और व्यापक शिक्षा के अभाव के कारण यह पूरी तरह विकसित नहीं हो पा रही है। उन्होंने बीमा कंपनियों से केवल व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने की अपील की। इसके बाद, 1934 में एक उप-समिति का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य यह अध्ययन करना था कि भारत में बीमा शिक्षा कैसे प्रदान की जा सकती है। इस समिति ने स्थानीय विश्वविद्यालयों से बीमा विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की और लंदन के चार्टर्ड इंश्योरेंस इंस्टीट्यूट तथा इंस्टीट्यूट ऑफ एक्चुरिज़ (Institute of Actuaries, London) की तर्ज पर एक भारतीय बीमा संस्थान और एक एक्चुरियल साइंस संस्थान स्थापित करने का सुझाव दिया। बीमा शिक्षा के लिए संस्थागत ढांचा
श्री के.सी. देसाई ने सुझाव दिया कि बीमा शिक्षा प्रदान करने के लिए एक कार्ययोजना बनाई जाए, जिससे बीमा कंपनियों को योग्य और प्रशिक्षित क इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्री पी.के. संतनम की अध्यक्षता में एक उप-समिति का गठन किया गया, जिसे बीमा शिक्षा के लिए परीक्षाओं की योजना बनाने और पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बीमा शिक्षा की औपचारिक शुरुआत 1943 में वार्षिक आम बैठक में इस समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी गई और निम्नलिखित निर्णय लिए गए:
बीमा शिक्षा के लिए परीक्षा आयोजित करने के लिए नए उपविधियों (Bye-laws) को जोड़ा गया। एक्जीक्यूटिव कमेटी को पाठ्यक्रम तय करने, परीक्षा बोर्ड नियुक्त करने और परीक्षाओं का संचालन करने की अधिकृत किया गया।
तीन भागों में परीक्षा प्रणाली लागू की गई, जिसके सफलतापूर्वक पूरा होने पर छात्रों को डिप्लोमा प्रदान किया जाता था।
पहली परीक्षा और आगे का विस्तार 1945 में पहली परीक्षा केवल भाग I और II के लिए आयोजित की गई।
1946 से तीनों भागों की परीक्षाएँ आयोजित की जाने लगीं।
मुंबई, कोलकाता और अन्य प्रमुख शहरों में मौखिक ट्यूशन कक्षाएँ आयोजित की गईं, जिनमें प्रमुख बीमा अधिकारी शिक्षण कार्य करते थे।सतारा स्थित चिर्मुले इंश्योरेंस इंस्टीट्यूट और मद्रास स्थित साउथ इंडिया इंश्योरेंस एसोसिएशन ने नियमित कोचिंग कक्षाएँ शुरू कीं।ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों के लिए पत्राचार (correspondence) पाठ्यक्रम भी प्रारंभ किए गए।बीमा शिक्षा के विस्तार में ILAOA की भूमिकाILAOA ने बीमा शिक्षा को संगठित और वैज्ञानिक रूप से विकसित करने के लिए गहरी रुचि ली। संगठन के अध्यक्षों ने सदस्य कंपनियों से अनुरोध किया कि वे अपने कर्मचारियों और फील्ड वर्कर्स को इन परीक्षाओं में सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहित करें। ILAOA की परीक्षाएँ केवल जीवन बीमा विषयों तक सीमित थीं, लेकिन यह भारतीय बीमा शिक्षा की आधारशिला साबित हुई। निष्कर्ष भारत में बीमा शिक्षा की नींव रखने में ILAOA का बड़ा योगदान रहा। बीमा शिक्षा की आवश्यकता को मान्यता दी गई और इसे संगठित रूप से विकसित करने के प्रयास किए गए। बीमा कर्मचारियों और एजेंटों को प्रशिक्षित करने के लिए औपचारिक परीक्षाओं और डिप्लोमा कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। स्थानीय विश्वविद्यालयों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के मॉडल को अपनाने की दिशा में कार्य किया गया। यह बीमा शिक्षा के क्षेत्र में भारत के लिए एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने बाद में इंश्योरेंस इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (Insurance Institute of India) जैसी संस्थाओं की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया

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